एक नई प्रेम कहानी

ए बिटिया...... इ का ह्यौ तनिक हमहुँ का दिखाव।

का अम्मा...

इहै जब से आईल बाटू सब्बै कोई एक्करै में बहुतै बिजी ह्यौ।

या ल्यै देख अम्मा इ स्मार्ट फोन ह्यौ।

तोहका चाही..... त हम हम इहें छोड़ जाब।

अरे बिटिया.... ई का बात करत हऊ, हम कहाँ एकै चरा पाऊब।

घबिड़ा जीन हम सबहीं त अभी इहाँ हईन हैं।

चार पाँच दिना लागी,सब सीखा दैब।

बहुते महँगा आत होई।

हमार वाला अब्बै ठीकै ह्यौ.....खूबै निक चलबो करत ह्यै..अब्बही ल्यै।

अम्मा फेर शूरू हो गईलू।

ए अम्मा स्मार्ट फोन चलावै का सीख लेबू त हमनीं के आराम होई जाई।

साँच बात त इ ह्यौ कि इ फौन तोहरै लागी लाईल रहली।

पढ़ल लिखल हलहीं हऊ फेर का...दुई दिन लागी....बाकी सब सीख जईबू

जब कबो बतिआवे का जिऊ करी... बस एक मिस कॉल दे दीह।

रिचार्ज के चिन्ता जीन करीहऽ हम जब- जब आपन रिचार्ज कराऊब तोहरो फोन करा दैब।

हम बात करी लेब तोहँसे...... फ्री टाईम मैं।

फेर इहमें विडियो काॅलिंग के सुविधौ ह्यौ......

जब ल्यै बतियात घड़ी मुँह ना देख लेई यौ मन नाँ हीं मानै।

तोहके इहमें टाईप करै का सिखा दैब त वाट्सऐप्प पर दिना भर लागल रहीहऽ....

सब कोन्हन के नम्बरौ डारो रखै है इहमैं।

तोहार निम्मन टाईम पास होई जाई।

अब शुरू हुई चौबीसो घण्टे की दादी को मोबाइल चलाना सिखाना की कवायद....

खुद जागृति, विप्लव,पोता,पोती और हाँ लगे हाथ ससुर जी भी।

जो शाम की हनुमान चौरा में रोज के रामायण पाठ के समय आने वाले लोगों से कभी कभार उत्सुकतावश स्मार्ट फोन लेकर चलाया करते थे।

अपने टेक्नो ज्ञान देने से ना चूकते और अम्मा फिस्स से दाँत निपोर देती कहतीं......

तु..... त.... रहे.... द....जब यै लोग चल जईहें फेर दिखइह.....आपन ज्ञिआन तब देखब कतना आवत ह तोहके।

शनै शनै जाने का दिन भी नजदीक आ गया और अम्मा विडियो काॅलिंग पर सबको शहर में देख पाने के लालच में बच्चों से बिछड़ने का दुख भूल गई।

हर बार की तरह इस बार भी...

अम्मा कोई ना कोई बहाना खुशी से जीने के लिए तलाश हीं लेती थी...

आखिर औरत जो ठहरी....

बाऊ जी आय रहे नाला पार तक और अम्मा बैठी मोबाइल को निहारत रही।

चलते समय बोलीं चहुँप के विडियो काॅल करीह तनिक देखऊ ससुर शहर मैं कइसे रहत ह्यौ तुम सब्बभन।

पर शहर आने को तैयार नहीं भई......दुईयो दिना खातिर अब ई बुढऊती में कहाँ ठठब।

अईहये की हवा पानी रास आयै है बस।

और घर की देहरी से......हम परदेसी अपना कलेजा टाँग आये और शरीर दुनियादारी निभाने निकल पड़ा।

बस नाला पार करत करते रूँधे गले से यही निकला......

बाऊ जी कौवनो परेशानी होई त दिनाऽ राती नाँ हीं देखब बस एक काॅल।

अगर हम सब्बहैं ना पाऊब तो कौन्नो बात नाँ हीं....घबडाऊब जीन।

अतना बनाकर रख्खै हैन सबसे अबहुँ,

सब मैं सै कोऊ ना कोऊ दस मिलिट कै भितरै अई जाई।

तभी ड्राइवर ने कहा लेट हो गये तो ट्रेन छूट जायेगी और कार की रफ्तार बढ़ा दी।

पीछे मुड़कर कर देखा तो गाँव में सबसे गुस्सैल कहे जाने वाले ससुर जी दोनों हाँथों से आँखों को पोंछ रहे थे।

लेकिन हर बार की तरह इस बार आँसू छिपाने की कोशिश नहीं करी वो मौन बहुत कुछ कह गया हमसे।

उदास मन से सब ट्रेन में बैठ तो गए पर वक्त काटे नहीं कट रहा था।

वहीं अम्मा तो जैसे छोटी बच्ची बन गई थी।

हर घण्टे दो घण्टे पर फोन कर कहतीं पहुँच जईह त बतईह फेर बात करूब।

लंबे सफर से थके बच्चे घर में घुसते ही नहाकर ब्रेड बटर खा सो गए।

जागृति भी इतने दिनों से बंद पडे घर की सफाई में जुट गई कामवाली को काॅल कर फिर लंच भी बनाना था।

विप्लव अपने आॅफिस की तैयारी में।

उनके जाने के बाद कामवाली आई।

बाई के साथ मिल सारा काम खत्म होने पर सफर की थकान से टूटते शरीर को कब बोरी की तरह सोफे पर धम्म से पटक, वहीं सो गई पता ही नहीं चला।

उधर मायके वाले हाल समाचार के लिए काॅल करते रहे पर मोबाइल पर्स से निकालने को भी याद ना रहा।

रात को जब विप्लव लौटे तब डोर बेल की आवाज से नींद टूटी तो रात के दस बज रहे थे।

दरवाजे पर ही विप्लव ने कहा फोन कहाँ है कब से सब काॅल कर रहे सब उठाती क्युँ नहीं।

जागृति ये जा की वो जा....

आत्म ग्लानि से भरी.... की हाय.....अम्मा बेचारी बच्ची की तरह विडियो काॅल की आस लगाये बैठी होंगी।

लेकिन रात के दस बज गए और गाँव में सब अन्धेरा होते ही सो जाते हैं यह सोच फोन सुबह कर लूँगी सोचती है।

विप्लव बच्चों सबको खाना बना खिला सब काम खत्म कर जैसे ही फिर सोने के लिए कमरे में जागृति आती है तो घड़ी साढ़े बारह बजाती है।

दिन भर के काम और सफर की थकान से विप्लव दो मिनट में सो जाते हैं।

लेकिन ग्लानि से भरी जागृति बेड पर उलटती पटलती रहती है।

वहीं अम्मा गाँव भर को नम्बर देने के चक्कर में मोबाईल का सारा बैंलेस खत्म कर लेती हैं।

अब जब भी काॅल करती तो उधर से रिचार्ज करवायें कहता।

इसी उधेड़बुन में पडी अम्मा को कंपनी की एक फ्री काॅल आती है और नम्बर पर फ्री की काॅल बताता है।

वह तरह तरह गाने और बातें कम्प्यूटरीकृत आवाज में सुनाता रहता है।

अम्मा की बाँझैं खिल जाती हैं वह हर दस मिनट पर उसपर काॅल कर कम्प्यूटरीकृत आवाज सुनती रहती हैं।

इधर जागृति रात को तीन बजे ग्लानि से भरी काॅल पर काॅल कर रही होती है पर हर बार यही जवाब मिलता है....इस रूट की सभी लाईनें व्यस्त हैं कृप्या थोड़ी देर बाद डायल करें।

वहाँ गाँव में फोन की बैट्री डिस्चार्ज हो जाती है और जागृति को जवाब मिलता है इस बार....

द नम्बर यू आर ट्राईंग टू काॅल इज स्विचड ऑफ प्लीज ट्राई लेटर।

परेशान अम्मा और जागृति फोन लिये लिये ही सो जाते है।

सुबह गईया का सानी बनाने चार बजे अम्मा उठती हैं तो मोबाइल को सबसे पहले चार्ज में लगाती हैं।

वहीं जागृति भी पौने पाँच में बच्चों को आज से स्कूल भेजने के लिए उठती है अलार्म की आवाज से।

लेकिन आज सबसे पहले पहली बार भगवान को नमस्कार किये बगैर ही गाँव फोन लगाती है।

अम्मा जैसे ताके बैठी हीं हों तुरंत फोन उठा लेती है।

विडियो काॅलिंग पर दोनों कुछ नहीं कहते.....बस आँखों से बहते झरने.....

विरह और ग्लानि..... आपस में बतिया लेते हैं।

जागृति पूरे घर में कैमरा घूमा घूमा कर सोते विप्लव और बच्चों को दिखलाती है और यह भी की देखह अम्मा जतना में आपन रसोईघर ह्यौ ओतनै में हम सबब्भै इहाँ रहीत हई।

यहौ..... की.....सुखन घर नाँ हीं छोडन हैं।

कमाऊब नाँ ही त सबब्भकर खर्चा उठाऊव कइसै कर।

अम्मा संतोष के साथ जुग जुग जीऔ का आशीर्वाद दे फोन काट देती है।

पुनः सभी अपनी रोज की दिनचर्या में मशगूल हो जातें हैं।

जागृति तरह तरह के ढेरों विडियो रोज भेजती रहती है।

वहीं बच्चे दादा जी, तेजे भईया (लगार है गाय दूहने आते हैं) से गईया बछिया से विडियो पर पता नहीं क्या क्या बतलाते रहते हैं।

लेकिन अम्मा को ऊ कम्प्यूटर वाली बिट्टी की बात सुनै मैं बड़ा मजा आत है।

तो जब कोऊ नहीं बात करत त ऊ बस ऊहै से बतियान लागीत रहती हैं।

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